भारत-चीन संबंध : प्रतिस्पर्धा, सहयोग और भविष्य की दिशा


लेखक:
PathPrerna Team
तारीख: [04-11-2025]

🌏 प्रस्तावना

भारत और चीन — एशिया की दो सबसे बड़ी शक्तियाँ हैं। दोनों देशों के बीच हजारों वर्षों पुराना सांस्कृतिक, व्यापारिक और ऐतिहासिक संबंध रहा है। लेकिन आज के दौर में ये रिश्ते जटिल भी हैं — कभी सहयोग तो कभी तनाव। सवाल यही उठता है कि 21वीं सदी में भारत-चीन संबंध किस दिशा में जा रहे हैं?


⚔️ सीमाओं पर तनाव और सुरक्षा मुद्दे

भारत-चीन संबंधों में सबसे बड़ा विवाद सीमा विवाद है। 1962 के युद्ध के बाद से अब तक कई बार दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति बनी।

  • गालवान घाटी (2020) की झड़प ने आपसी विश्वास को गहरा झटका दिया।

  • दोनों देश अभी भी LAC (Line of Actual Control) पर भारी सैन्य उपस्थिति बनाए हुए हैं।

हालांकि हाल के वर्षों में कुछ वार्ताएं हुई हैं, लेकिन स्थायी समाधान अभी भी दूर है।


💰 आर्थिक संबंध और व्यापारिक सहयोग

राजनीतिक तनाव के बावजूद, भारत और चीन के बीच व्यापारिक संबंध मज़बूत बने हुए हैं।

  • चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है।

  • 2024 में दोनों देशों के बीच व्यापार 130 अरब डॉलर के करीब पहुँचा।
    फिर भी, व्यापार संतुलन चीन के पक्ष में भारी झुका हुआ है, जो भारत के लिए चिंता का विषय है।

भारत अब “मेक इन इंडिया” और “वोकल फॉर लोकल” जैसे अभियानों से चीन पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है।


🛰️ सामरिक और वैश्विक प्रतिस्पर्धा

भारत और चीन एशिया में नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा में भी हैं।

  • भारत क्वाड समूह (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया के साथ) में सक्रिय है।

  • जबकि चीन Belt and Road Initiative (BRI) के ज़रिए अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है।

यह प्रतिस्पर्धा केवल सीमा तक सीमित नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र, अफ्रीका और दक्षिण एशिया तक फैल चुकी है।


🤝 सहयोग की संभावनाएँ

तनाव के बावजूद, दोनों देश जलवायु परिवर्तन, ब्रिक्स (BRICS) और SCO जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सहयोग भी करते हैं।
अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखे तो व्यापार, प्रौद्योगिकी, और क्षेत्रीय स्थिरता के क्षेत्र में बेहतर तालमेल संभव है।


🧭 निष्कर्ष

भारत और चीन के रिश्ते न प्रतिस्पर्धा से पूरी तरह परे हैं, न सहयोग से पूरी तरह जुड़े।
भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि दोनों देश पारस्परिक सम्मान और भरोसे की दिशा में कितनी दूर तक कदम बढ़ाते हैं।
अगर एशिया को 21वीं सदी में विश्व नेतृत्व देना है, तो भारत और चीन — दोनों का साथ मिलकर आगे बढ़ना ज़रूरी है।

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